Wednesday, June 15, 2011

मैं खुद से सवाल करती हूं और............



[चर्चित लेखिका संतोष श्रीवास्तव से लेखिका,शायरा सुमीता केशवा की शब्द के लिए विशेष बातचीत]
अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हिन्दी साहित्यकार हिन्दी साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनमें से एक हैं संतोष श्रीवास्तव। जो अपनी विशिष्ट भाषाशैली, संवेदनशीलता एवं सादगी के लिए जानी जाती हैं। 'बहके बसंत तुम', 'बहते ग्लेशियर, यहां सपने बिकते हैं, 'प्रेम संबंधों की कहानियां' [ कथा संग्रह ] मालवगढ़ की मालविका, 'दबे पांव प्यार',' टेम्स की सरगम' [उपन्यास] हवा में बंद मुठ्ठियां [सहलेखन उपन्यास] 'मुझे जन्म दो मां' [स्त्री विमर्श उपन्यास] नहीं अब और नहीं [संपादित संग्रह] नीले पानियों की शायराना हरारत [यात्रा संस्मरण] फागुन का मन [ललित निबंध संग्रह] आपकी प्रकाशित कृतियां हैं। हेमंत फाउंडेशन की प्रबंध न्यासी तथा जे.जे.टी. यूनिवर्सिटी में को-आर्डिनेटर के पद पर कार्यरत आपको हिन्दी साहित्य में किए गए योगदान के लिए कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं जिनमें प्रमुख हैं- कालिदास पुरस्कार, महाराष्ट्र साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि पुरस्कार, प्रियदर्शनी अकादमी पुरस्कार, महाराष्ट्र दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार, वसंत राव नाइक लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, कथाबिंब पुरस्कार, कमलेश्वर स्मृति पुरस्कार,प्रियंका चेरिटेबल ट्रस्ट [लखनऊ]साहित्य सम्मान, आदि प्रमुख हैं। देश की विभिन्न साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में आप लगातार छप रही हैं। 'शब्द' के लिए जब मैं संतोष जी से बात करने उनके घर पहुंची तो उनकी सादगी और खुशमिज़ाजी देख कर दंग रह गई......उनके जीवन के हादसों को मैं कुरेदना नहीं चाहती थी किन्तु उन्होंने एक लौह महिला की तरह सामना करते हुए मुझे अपने पत्रकार रूप में ही स्वीकारना पसंद किया। प्रस्तुत है संतोष जी से की गई बातचीत के कुछ अंश-
सुमीता : संतोष जी, आपकी पहली कहानी सत्रह साल की उम्र में छपी। लेकिन आमतौर पर इस उम्र में लड़कियां कुछ और ही सपने देखती हैं। क्या आपने वो सपने नहीं देखे ?
संतोष : जी बिल्कुल, वह उम्र होती ही खतरनाक है। मेरी हम उम्र लड़कियां ईश्क के चर्चे करतीं....सिल्क, शिफ़ान,किमख्वाब, गरारे,शरारे में डूबी रहतीं, मेंहदी रचाती, फ़िल्मी गाने गुनगुनाती, दुल्हन बनने के ख्वाब देखतीं, तकियों के गिलाफ़ पर बेल बूटे काढ़ती थीं। मैं कभी अपने को इस सब में नहीं पाती। मेरे अंदर एक खौलता दरिया था। जिसका उबाल मुझे चैन न लेने देता....दिन में आंखों के सामने कोर्स की किताबें होतीं। रात दो-दो बजे तक कागज़ कलम थामें दुनिया जहान को टटोलने की कोशिश शब्दों के जरिये करती। इस जद्दोजहद में कब शब्द अपने गूढ़ अर्थों सहित मेरे दोस्त बन गये मुझे पता ही नहीं चला। मैंने इस दोस्ती के जरिये झूठी मान्यताओं, थोथी परंपराओं, अंधविश्वासों को ललकारा और किसी भी अवरोध की परवाह नहीं की। मैं इस सब के खिलाफ़ दृढ़ता से खड़ी तो हुई पर अपनी आवाज़ जन-जन तक पहुंचाने के लिए मुझे पत्रकार बनने की धुन सवार हो गई।
सुमीता : संतोष जी, अब मैं यह जानना चाहूंगी कि पत्रकारिता के लिए आप जबलपुर में होम सांइस कालेज में लगी अपनी लेक्चररशिप छोड़कर मुंबई आ गयीं...इतना कड़ा कदम आपने मात्र पत्रकारिता के लिए कैसे उठा लिया?
संतोष : सुमीता जी, पत्रकारिता तो करनी ही थी और मैं एक नई जमीन की तलाश में थी उन्हीं दिनों सुरेन्द्र प्रताप[एस.पी] कलकत्ता से मुम्बई धर्मयुग में बतौर आये । उन्होंने मेरे बड़े भाई विजय वर्मा को भी अपनी योग्यता के लिए उचित प्लेटफार्म मिलेगा ऐसी सलाह देकर मुम्बई बुला लिया। पर वे यह नहीं चाहते थे कि मैं अपनी लगी लगाई नौकरी छोड़कर मुम्बई आऊं। मुझ पर तो पत्रकारिता का नशा चढ़ा था। मैं तमाम अव्यवस्था के खिलाफ हल्ला बोलना चाहती थी। सो मैं मुम्बई आ गई। काम भी मुझे बहुत मिला। डेस्क वर्क मैं करना नहीं चाहती थी, फ्री लांस ही किया। नवभारत टाइम्स में मैं बदस्तूर लिखने लगी। आर.टी.वी.सी में कई कमर्शियल कार्यक्रम लिखे, जो रेडियो टी.वी पर प्रसारित होते थे। लिंटाज़ में कई ज़िंगल लिखे। धर्मयुग में 'अंतरंग' स्तंभ दो साल तक लिखा। नवभारत टाइम्स में 'मानुषी' स्तंभ तीन साल तक लिखा। संझा लोकस्वामी में दो वर्षों तक साहित्य का पन्ना संपादित करती रही। ललित पाहवा ने 'मेरी सहेली' में संपादक के पद का आफर दिया। पर उसका कलेवर मेरे मिज़ाज के खिलाफ़ था। सो इंकार कर दिया। 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' और 'वीर अर्जुन' अखबार की मैं मुम्बई ब्यूरो चीफ़ रही।
सुमीता :मेरा अगला सवाल मार्क्सवाद को लेकर है क्या आप मार्क्सवाद से सहमत हैं? अधिकतर लेखक मार्क्सवादी हैं या प्रगतिशील विचार धारा के इस पर आपकी राय जानना चाहूंगी।
संतोष : एक ही बात है ...कोई एक सिद्धांत को मान लो और चलो उस पर, ऐसा भी होता है पर मैं उनमें से नहीं । मैंने अपने विचारों पर किसी वाद को हावी नहीं होने दिया। मेरी अपनी सोच, समझ और अनुभव ही मेरे काम आए, आ रहे हैं। हालांकि मेरे बड़े भाई मार्क्सवादी थे । घर में मार्क्सवादी किताबें पढ़ -पढ़ कर मैंने जाना व्यक्ति क्या है,राष्ट्र क्या है और विश्व क्या है? गीता में तो बहुत पहले कह दिया गया है कि कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो। लेकिन व्यक्ति फल की चिन्ता करना नहीं छोड़ता बल्कि इस बाज़ारवाद के युग में फल केन्द्र में आ गया है और यही वजह है कि तमाम राष्ट्र आतंकवाद को झेल रहे हैं। धर्म के नाम पर जेहाद, यह कहां की इंसानियत है?
सुमीता : आप किसी साहित्यिक खेमे या वाद से न जुड़कर लेखन के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाये हैं। यह कैसे संभव हुआ?
संतोष : सुमीता जी, मैं आपको बता चुकी हूं कि मैं किसी भी खेमे या वाद के झमेले से कोसो दूर हूं। मैं मानती हूं कि लेखन एक ऐसा सफ़र है जिसमें हमारी पिछली पीढ़ीयां और आने वाली पीढ़ीयां मेरी हमसफ़र । मैं तमाम वैग्यानिक दुरुपयोगों, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद, छिछली राजनीति, इंटरनेट और साहित्य की चुनौतियों के सामने जिरह बख्तर बांध कर खड़ी हूं। मेरी लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ़ है अंडरवर्ल्ड ,ड्रग लीडरों , माफ़िया, आतंकवादियों और नक्सलवाद को तो खत्म नहीं कर पायी लेकिन इस विराट समाज़ में उन मुट्ठी भर लोगों को जीवन शैली जरुर बेच रही है कि पिज़्ज़ा खाओ, बर्गर खाओ, ठंडा मतलब.....? पिओ और योगा क्लासेज़ ,लाफ़िंग क्लब ज्वाइन करो क्योंकि हम तुम्हारी पाचन शक्ति, तुम्हारी हंसी छीन रहे हैं।
सुमीता :देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आपके लेख,स्तंभ और कहानियां छ्पती रहती हैं और आप कालेज में को-आर्डिनेटर के पद पर भी कार्यरत हैं। लिखने के लिए इतना वक्त कैसे निकाल लेती हैं ?
संतोष : किसी भी काम के लिए वक्त तभी निकल सकता है जब उस काम के प्रति हमारा लगाव हो,रूझान हो। अब देखिए लोग घंटों बैठे टी.वी. देखते हैं, विंडो शापिंग करते हैं, यारबाज़ी करते हैं, शामें नाईटक्लबों, मयखानों में गुज़ारते हैं....नौकरी वे भी तो करते ही हैं न ।...इसी तरह मैं भी यूनिवर्सिटी से बचा समय लिखने-पढ़ने में गुज़ारती हूं । पत्रिका के विशेषांकों के लिए लेख, स्तंभ संपादक दबाव डालकर लिखवा लेते हैं। साहित्यिक आयोजनों में शिरकत करने का दबाव आयोजकों की ओर से होता है। यह दबाव चूंकि मेरी रूचि का होता है तो समय निकल ही आता है। इन दिनों मैं अपने देश विदेश के यात्रा संस्मरणों की पांडुलिपि तैयार कर रही हूं और 'पाब्लो नेरूदा' को पढ़ रही हूं जो मेरे लिए अदभुत अनुभव है।
सुमीता : आपने अब तक जो कुछ भी लिखा उसकी कितनी सामाजिक उपादेयता है, क्या आप अपने लेखन से संतुष्ट हैं ?
संतोष : जीवन में बेहद जरूरी है संतुष्टि। पर किसी भी कला में चाहे वह लेखन हो, चित्रकारी हो, गायन-वाद, नृत्य,अभिनय हो संतुष्टि खतरनाक है। कला में संतुष्टि जीवन को ठहरा जल बना देती है जिसकी नियति सड़ना है। मैं कभी भी अपने लेखन से संतुष्ट नहीं होती। सुमीता जी, आपको एक बात बता दूं, मैं अपनी रचना की सबसे बड़ी आलोचक, समीक्षक हूं। रचना लिख ली, छप गई और जब पढ़ी तो पाया कि कितने सुधार की आवश्यकता है इसमें.... जहां तक सामाजिक उपादेयता का सवाल है ,यह बात मेरे पाठक तय करते हैं। मेरी रचना पर कई पत्र छपते हैं। कई फोन, कई एस एम एस आते और कई ई-मेल आते हैं। रचना को सार्थक पाठक ही बनाते हैं।
सुमीता : अबतक आपके जितने भी उपन्यास आए हैं लगभग वे सभी प्रेम से सराबोर कर देने वाले रहे किन्तु आपकी हाल ही में प्रकाशित उपन्यास 'मुझे जन्म दो मां' अपने बोल्ड विषय को लेकर काफ़ी चर्चित रही उसमें आपके पत्रकार कौशल का विद्रोही तेवर देखने को मिला । इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा आपको कहां से मिली ?
संतोष : मैंने अबतक चार उपन्यास लिखे हैं । 'मालवगढ़ की मालविका' सती प्रथा के विरोध में एक सामंती परिवार की कथा है जिसका एक अंश 'मंगल पांडे' फ़िल्म में भी फिल्माया गया है। जब विधवा स्त्री को सती करने के लिए शमशान ले जाया जा रहा है और एक अंग्रेज़ घोड़े पर आकर उसे बचाता है। दूसरा उपन्यास 'हवा में बंद मुठ्ठियां' सहलेखन [प्रमिला वर्मा के साथ] क उपन्यास है इसमें भी एक आम मुस्लिम परिवार की जीवन के उतार चढ़ानों, फ़ैसलों की कथा है। प्रेम इसमें भी है पर त्याग भरा......जीवन की ज़रूरतें त्याग करवा डालती हैं। सम्पूर्ण रूप से प्रेम पर आधारित 'दबे पांव प्यार' और 'टेम्स की सरगम' उपन्यास हैं। 'टेम्स की सरगम' में प्रेम की अथाह गहराई है और दो देशों का अदभुत संगम है। मुझे खुद नहीं पता कि कैसे मैं प्रेम पर इतना व्यापक लिख गई। मैं महीनों उस नशे से उबर नहीं पाई थी। 'मुझे जन्म दो मां' स्त्री विमर्श पर आधारित लेखों का संग्रह है। मेहरून्निसा परवेज़ जब समरलोक [भोपाल] पत्रिका लांच कर रही थीं तब उन्होंने मुझे स्त्री विमर्श का कालम 'अंगना' लिखने का आमंत्रण दिया। पिछले बारह वर्षों से मेरा यह कालम बदस्तूर जारी है और बेहद चर्चित व प्रशंसित भी हुआ। उन्हीं लेखों को मैंने इस संग्रह में विस्तार दिया। इन लेखों में औरतों को लेकर मैंने कई सवाल उठाए हैं। जो बचपन से मेरे जेहन में घर किए हैं। क्यों परिवार की मान मर्यादा शिष्टता की सीमा रेखा लड़कियों को ही दिखाई जाती है, लड़कों को नहीं। क्यों पिता, भाई, पति और बेटे की सुरक्षा के घेरे में वह ज़िंदगी गुज़ारे? क्यों सारे व्रत, उपवास, नियम-धरम औरतों के ज़िम्मे? क्यों पति और पुत्र के कल्याण के लिए ही सारे व्रत,पूजा, अनुष्ठान? क्यों नहीं औरतों के लिए यह सब? यह करो, यह मत करो, ऐसो उठो, ऐसे बैठो की संहिताएं बस लड़कियों के ज़िम्मे.... मुझे इस सबसे चिढ़ थी। मेरे अंदर इसके विरोध में गुबार भरता गया था और मैंने ठान लिया था कि मौका पाते ही मैं इस सबके खिलाफ कलम थामूंगी। उसी का नतीजा है 'मुझे जन्म दो मां' । मुझे खुशी है कि मैं अपनी वैयक्तिक अनुभूतियों को सामाजिक संदर्भ देकर सहयोग, साहचर्य और सहकारिता की वैकल्पिक नारी संस्कृति लिख सकी और नारी विषयक वैचारिक अवरोधों के खिलाफ़ हल्ला बोल सकी।
सुमीता : आपने एकाकी जीवन जिया है किन्तु आपके पात्र प्रेम के समंदर में गोते लगाते रहे....कैसे आपने उन प्रेम भरे खूबसूरत लम्हों को अपने पात्रों में बांटा या जिया ?
संतोष : बहुत खूबसूरत सवाल है आपका सुमीता जी। एकाकी जीवन जीते हुए इंसान इस समूची कायनात को बड़ी गहराई से परखता है। चूंकि ईश्वर के द्वारा पारिवारिक माहौल से मैं महफ़ूज़ कर दी गई इसलिए सबसे पहले तो मैंने उसी को परखा तो पाया कि वह तो अपनी रची सृष्टि के कण-कण में मौजूद है। प्रकृति हमें प्रेम करना ही तो सिखाती है जैसे चकोर करता है चांद से, जैसे हवा करती है पेड़ों की शाखों-पत्तियों से, जैसे भंवरा करता है फूल से, परवाना शमा से, समंदर किनारों से....वह बार-बार भेंटता है और भेंटकर खुशी की गर्जना करता है। लहरें चांद को पाने की कोशिश में ज्वार बन ऊंची-ऊंची उठती हैं.... यह क्या प्यार नहीं ? मैंने अपने हर लम्हे को अपने पात्रों के संग जिया है। जब मेरी कहानी का नायक नायिका के बाल सहलाता है तो मैं सिहर उठती हूं। मेरे उपन्यास 'मालवगढ़ की मालविका' की नायिका जब सूनी वीरान हवेली में भटकती है, जार जार रोती है तो यकीन मानिये मैं हफ़्तों डिस्टर्ब रही थी। मेरा लेखन पहले मुझे टकोरता है फिर पाठकों तक पहुंचता है।
सुमीता : संतोष जी सच कहा आपने जिसने प्रकृति के प्रेम को समझा वही प्रेम को महसूस भी कर सकता है। आपको कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया है लेकिन आपकी सादगी और सरलता के सामने ये बौने और निरर्थक प्रतीत होते हैं? आज भी आप उतनी ही सक्रिय हैं पुरस्कारों का सिलसिला अब भी जारी है। आपको इतनी उर्जा कैसे और कहां से मिलती है?
संतोष : मुझे महाराष्ट्र के गवर्नर एस.एम.कृष्णा के हाथों राजभवन में सन २००४ में लाईफ़ टाइम अचीव्हमेंट अवार्ड से नवाज़ा गया था जो मुझे भारत के विभिन्न प्रदेशों की आदिवासी और बंजारा जनजाति की महिलाओं के हालात जानने समझने और लिखने पर मिला था। इनका जिक्र मैंने 'मुझे जन्म दो मां' में विस्तार पूर्वक किया है। इन बीहड़ आदिवासी इलाकों में जाने के लिए मुझे महाराष्ट्र सरकार,उड़ीसा सरकार तथा अंडमान निकोबार सरकार ने हर तरह की सुविधाएं मुहैय्या कराईं। इसके अलावा मिले कई राष्ट्रीय पुरस्कारों ने जहां एक ओर मुझे खुशी दी वहीं दूसरी ओर इस बात का एहसास भी कराया कि मेरे लेखन का जो मूल्यांकन हुआ है उसे मुझे आगे भी बरकरार रखना है। मुझे और अधिक सार्थक और प्रौढ़ लेखन करते रहना है ताकि ऊंचाईयों पर मेरी स्थिति कायम रहे और यही मेरी ऊर्जा की वजह है। मेरे लिए प्रतिदिन थोड़ा समय लेखन को देना उतना ही जरूरी है जितना ज़रूरी शरीर के लिए भोजन है।
सुमीता : आप हेमंत फाउंडेशन की अध्यक्ष भी हैं और आपकी संस्था पिछ्ले १२ वर्षों से देश के विभिन्न क्षेत्रों से कई कवि एवं साहित्यकारों को सम्मानित कर चुकी है। यह आपकी निष्पक्ष पारदर्शिता को दर्शाता है,जबकि साहित्यिक राजनिती में अक्सर जोड़-तोड़ के कयास लगाये जाते हैं। इस पर आपकी क्या राय है?
संतोष : यह सही है कि पुरस्कारों को लेकर कुछ संस्थाओं ने अरूचिकर माहौल पैदा कर दिया है। कई पुरस्कार तो प्रविष्टियों के साथ रूपिये भी मंगवाते हैं, कई पुरस्कार खरीदे-बेचे जाते हैं......बाज़ारवाद रचना जैसे शुद्ध साहित्यिक, सृजनात्मक कर्म में भी किये है। 'हेमंत फाउंडेशन' ऐसे बाज़ारवाद से परे है। न तो हमारी संस्था पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित करती है और न कभी निर्णायक मंडल का नाम ही घोषित करती है। यह गोपनीयता हमारी संस्था की पहली शर्त है। इसीलिए 'विजय वर्मा कथा सम्मान' तथा 'हेमंत स्मृति कविता सम्मान' अपनी पारदर्शिता के लिए प्रसिद्ध है।
सुमीता : आपकी उपलब्धि एक अंतरराष्ट्रीय लेखिका के रूप में है। यहां तक पहुंचने के लिए आपको कौन-कौन सी रुकावटें झेलनी पड़ी?
संतोष : नहीं सुमीता जी, कोई रुकावट नहीं झेलनी पड़ीं। हुआ यूं कि सन २००२ में नई दिल्ली में महिला पत्रकारों का राष्ट्रीय सम्मेलन सैंट्रल सोशल वेल्फ़ेयर बोर्ड तथा वुमेन नेटवर्क लिमिटेड की ओर से हुआ था जिसमें महाराष्ट्र की ओर से मैंने प्रतिनिधित्व किया था। दो दिन के इस राष्ट्रीय सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ की ओर से सदस्यता आफ़र हुई। यह संस्था भारत सरकार की मदद से विदेशों में हिन्दी के लिए कार्य करती है। तब से मैं जर्मनी, इंग्लैंड, इटली, रोम, हालैंड, स्काटलैंड, आस्ट्रिया,बेल्जियम,फ्रांस समेत चौदह देशों की यात्रा कर चुकी हूं। इस वर्ष मास्को जाना है। मास्को का एक प्रोजेक्ट भी पूरा करने में जुटी हूं।
सुमीता : विदेश यात्रा के दौरान कोई ऐसा वाकया जिसने आपको विचलित किया हो या रोमांचित किया हो? बताएं ।
संतोष : गांधी जी ने कहा था अगर देश को समझना है, विश्व को समझना है तो उसे नज़दीक से जाकर देखो। घुमक्कड़ी मेरा स्वभाव है। कंधे से लटकता बैग,बैग में गंतव्य की जानकारी, नक्शा, कैमरा और मोबाइल....बस, इस जीवन शैली में न तो कभी उम्र ने रुकावट डाली और न सहयात्री ने। मैंने विभिन्न देशों के प्रकृति, वहां के लोगों का रहन सहन, खानपान, भाषा में खुद डुबोया है। अक्सर लोग मनोरंजन के लिए यात्रा करते हैं लेकिन मैं कुछ नया सीखने के लिए यात्रा करती हूं। मेरे लिए प्रकृति सबसे बड़ा शिक्षक है। मेरी पहली विदेश यात्रा की उड़ान जर्मनी के लिए थी। मेरे साथ १८ प्रतिनिधि सदस्यों का दल था। जर्मनी के फ़्रेंकफ़र्ट शहर के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे में इमीग्रेशन के दौरान जर्मन अधिकारी ने अंग्रेज़ी में पूछा-'' आप लेखिका हैं? इंडिया से? किस विषय पर लिखती हैं? यहां आपको किसी तरह की मदद चाहिए तो यह रहा मेरा कार्ड ।'' मैं सुखद आश्चर्य से भर उठी थी। अपने लेखिका होने पर गर्व तो हुआ ही साथ ही यह एहसास भी कि जर्मनी में लेखकों की कितनी कद्र है फिर चाहे वह किसी भी देश का क्यों न हो। जर्मनी ने संस्कृत भाषा को विश्व मंच पर लाने में अहम भूमिका निबाही है। अक्टूबर २०१० में मैं जापान गई थी। सुना था जापानियों के देश प्रेम का किस्सा और अभी-अभी आये सूनामी संकट में पूरे विश्व ने देखा जापान का आत्मसम्मान, सहिष्णुता, देशप्रेम । किसी भी देश से कोई मदद लिए बिना इस विभिषिका को अपने बलबूते पर निपटने में लगा है जापान। मैंने जापाने गांवों की यात्रा की, महानगरों की यात्रा की तो पाया कि जापानी अपने देश अपनी भाषा से बेहद लगाव रखते हैं। वे किसी अन्य भाषा में बात करना पसंद नहीं करते। उन्होंने अंग्रेज़ी का सारी शब्द ही अपनाया है जिसका इस्तेमाल वे टूरिस्टों के लिए करते हैं। वहां नीली शर्ट और सफेद शर्ट पहने कई नौजवान दर्शनीय स्थलों, माल, मंदिर, बौद्ध मठ, चर्च और अन्य दर्शनीय स्थलों में मिल जाएंगे जिनकी शर्ट की दाहिनी आस्तीन पर इंग्लिश लिखा है। ऐसे लोग बिना कोई मेहनताना वसूले टूरिस्टों की मदद करते हैं। हिरोशिमा नागासाकी को एक स्मृति स्थल बनाने में जापानियों ने दिन रात मेहनत की थी। उन्होंने सालों तक एक भी छुट्टी नहीं ली थी कि कहीं देश की प्रगति रुक न जाए। मैं जापानियों के इस जज़्बे को सलाम करती हूं।
सुमीता : बल्गारिया से आई छात्रा डोरा जो उड़ीसा की आदिवासी महिलाओं पर शोध कर रही थी और महाराष्ट्र सरकार ने आपको उसका को-आर्डिनेटर नियुक्त किया था... बड़े रोचक अनुभव रहे होंगे आपके ?
संतोष : डोरा बल्गारिया निवासी होकर भी ऐसी हिन्दी बोलती थी कि मैं हैरत में पड़ जाती थी। उसका साथी आरसोव भी बेहतरीन हिन्दी का विद्वान था। डोरा के साथ हमने उड़ीसा के जिन आदिवासी क्षेत्रों का दौरा किया वे आज की दुनिया के लगते ही नहीं, भूत, प्रेत ,डायन,चुड़ैल की मान्यता वाले इन गांवों में आज भी बाटा पद्वति है। चावल दो बदले में शक्कर गुड़ लो। रुपया चलता ही नहीं है वहां। मेरे लिए तो उतने दिन जादुई दिन की तरह बीते । लगा जैसे एक अलग ही दुनिया में आ गई हूं। एक ऐसी दुनिया जहां शहरों की राजनीति का जहर नहीं फैल पाया है। सही अर्थों में प्रकृति पुत्र हैं ये।
सुमीता : ज़िंदगी को आप किस नज़रिये से देखती हैं?
संतोष : मैं मानती हूं कि ज़िंदगी हमें बस एक बार मिलती है अत: इसकी कद्र करना आना चाहिए। सुख दुख तो दाएं-बांए चलते हैं। जीवन-मरण हमारे हाथ में नहीं तब क्यों ज़िंदगी को दोष दिया जाये। मैंने हेमंत को खोया, पति खोया ......ज़िंदगी रुक तो नहीं गई । हां वक्त लगा इस सदमे की सच्चाई को आत्मसात करने में। पर अब मैं संभल गई हूं और हर हाल में खुश रहती हूं। ज़िंदगी को उत्सव की तरह जीना और उस पर विश्वास करना मेरा स्वभाव बन गया है। सारे आंसू मैंने हेमंत की मृत्यु पर बहा लिए...अब मेरा आंसुओं का कोष खाली है लेकिन मैंने खुद को पत्थर होने से भी रोका है। मैं मानती हूं कि ईश्वर से जितना जिसका आंचल है,उतनी ही सौगात मिलती है वह भी वक्त से पहले नहीं और किस्मत से अधिक नहीं।
सुमीता : आपको गद्य एवं पद्य दोनों विधा में महारत हासिल है। सुना है आजकल आप गज़ले भी लिख रही हैं। आपके ही एक शेर के साथ उत्तर चाहूंगी ।
संतोष : सदाएं मौजों की आती रहीं मेरी जानिब, समंदरों का कहीं भी कोई पता ही न था॥
सचमुच लेखक की कल्पना कहां-कहां पहुंच जाती है। स्कूल के दिनों में चन्द्रकान्ता संतति पढ़ने का जुनून चढ़ा...इस कदर कि बाबूजी नाराज़ न हों तो लिहाफ़ के अंदर टार्च की रोशनी में पढ़ती थी। फिर बकायदा कहानियां लिखने लगी। कविताएं संग-संग कागज़ पर उतरती रहीं। छपीं और सराही गईं। जनवरी २०११ में मुझे बहुभाषी कवि सम्मेलन में गोवा आमंत्रित किया गया। वहां मैंने एक गज़ल पढ़ी और यकीन मानिए कि उस गज़ल की बार-बार फरमाइश हुई। फिर पूना से रफ़ीक ज़ाफ़र साहब का फोन आया और मुम्बई में महिला दिवस के अवसर पर 'असवाक' उर्दू पत्रिका के लोकार्पण के दौरान रखे गये मुशायरे में मुझे आमंत्रित किया गया। बस तब से गज़ल विधा में मेरा पदार्पण हुआ। गज़लें लिखने का जुनून कुछ इस कदर है कि सिरहाने डायरी और कलम रख कर सोती हूं। नींद को बुलाना पड़ता है वह तो नहीं आती गज़ल आ धमकती है और मोबाइल की रोशनी में डायरी में उतरती चली जाती है। धीरे-धीरे उर्दू साहित्यकारों के बीच भी मैं पहचानी जाने लगी हूं। हेमंत फाउंडेशन ने एक हिन्दी उर्दू मंच भी स्थापित कर लिया है। जिसके अंतर्गत मुशायरे,काव्य गोष्ठी,सेमिनार वगैरह आयोजित किए जाएंगे। उर्दू के मशहूर लेखक डा.अब्दुल सत्तार दलवी का इस मंच से जुड़ना हमारी कामयाबी है।
सुमीता : आपने नाटकों में भी काम किया है। क्या अब भी आपके अंदर का पात्र कभी मचलता है नाट्यमंचन के लिए?
संतोष : कालेज के दिनों में कई नाटकों में भाग लिया था जिनमें मैं विभिन्न किरदारों को लेकर मंच पर उतरी, सराहना भी मिली। उन्हीं दिनों पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र के नाटक 'कृष्णायन' पर हमने एक नृत्य नाटिका तैयार की। जिसमें मानिनी राधा का रोल मैंने निभाया, यह भी कालेज स्तर पर सालाना जलसे में हुआ जिसमें विशेष अतिथि के रूप में फिल्म अभिनेत्री बीना राय आई थीं। अब भी मेरे अंदर का कलाकार कुलबुलाता है जबकि समय की आंधी उसे खत्म कर सकती थी पर मैं मानती हूं कि कला कभी खत्म नहीं होती....मौका मिले तो निश्चय ही नाट्य मंचन करुंगी। अभिनय और नृत्य मेरी कमजोरी है।
सुमीता : गुस्ताखी माफ, संतोष जी अब मैं आपके पाठकों की प्रतिनिधी होने के नाते आपके कुछ अंतरंग पहलुओं के दस्तावेजों में से कुछ पन्ने पलटना चाहूंगी । आपके एकाकी जीवन में आये वे लम्हें जब किसी ने आपके दिल में दस्तक दी होगी । आपको भी किसी से प्यार तो हुआ ही होगा, कृपया हमसे शेयर करें?
संतोष : निश्चय ही पाठकों को यह जानने का हक है। वैसे भी मेरी ज़िंदगी एक खुली किताब है। हालांकि ज़िंदगी का सफ़र तन्हा है पर - प्यार में जब तलक नहीं डूबे, दिल किसी काम का नहीं रहता।
सुमीता जी, जवानी में विद्रोही तेवरों की वजह से दिल कभी किसी के लिए नहीं मचला.....माता-पिता की खुशी के लिए शादी की वेदी में ज़िंदगी के महत्वपूर्ण साल शहीद हो गये। और फिर सब कुछ खत्म हो गया। मैं एक शापग्रस्त की तरह जब अपने शाप से मुक्त हुई तो पाया कि अब भी मेरे अंदर जज़्बातों की गठरी ज्यों की त्यों मौजूद है। प्रेम का प्याला लबरेज़ है और छ्लकने आतुर है। बिना प्रेम किये मर जाने से ज़्यादा दुखद कुछ और नहीं हो सकता। लेकिन इससे भी ज़्यादा तकलीफ़ की बात यह है कि जिसे हम प्रेम करते हैं, उसे यह बताए बिना ही दुनिया से विदा हो जाएं कि हम उससे प्रेम करते हैं । इसलिए साहस बटोर रही हूं । और खुद को उस गहराई,
ऊंचाई और विस्तार तक ले जा रही हूं ...उन हदों तक जहां केवल प्रेम ही पहुंच सकता है।
सुमीता : उस शख्स का नाम पूछ कर अब हम अपनी हद नहीं तोड़ेंगे संतोष जी, आपका शुक्रिया आपने अपना कीमती वक्त 'शब्द' और अपने पाठकों के नाम किया इसके लिए हम आपके बहुत-बहुत आभारी हैं ।
धन्यवाद ।
सुमीता केशवा
2204, क्रिमसन टावर
आकुर्ली रोड, लोखंडवाला
कांदिवली [ईस्ट]
मुम्बई- 101
फ़ो-29663666/ mo- 9773555567

3 comments:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

सुमीता जी इस प्रस्तुति के लिये हार्दिक आभार...

sumita said...

धन्यवाद रूपेश जी.दरअसल आपने इस इंटरव्यू को 'शब्द' के लिए चुना यह हमारे लिए भी गर्व की बात है। और मुन्नवर जी का प्रतिसाद तो पहले ही मिल चुका है। इस खूबसूरत पहल के लिए आप दोनो को हार्दिक बधाई औए शुभकामनाएं।

हरभूषण said...

बहन जी
पहली बात कि वैग्यानिक नहीं वैज्ञानिक...
दूसरी बात कि अंग्रेज द्वारा सती होती युवती को बचाने का दृश्य तो आचार्य चतुरसेन जी की एक बड़ी पुरानी रचना में पढ़ चुका हूँ
शब्द के प्रारंभ हेतु शुभकामनाएं स्वीकारिये।

 

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