Monday, June 13, 2011

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

ए अम्मा,ओ बापू,दीदी और भैया


आपका ही मुन्ना या बबली था

पशु नहीं जन्मा था परिवार में

आपके ही दिल का चुभता सा टुकड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

कोख की धरती पर आपने ही रोपा था

शुक्र और रज से उपजे इस बिरवे को

नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे माई

फलता भी पर कटी गर्भनाल,जड़ से उखड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?

अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं

सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज

मैं ही बस ममतामय गोद से बिछुड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

सबके लिए मानव अधिकार हैं दुनिया में

जाति,धर्म,भाषा,क्षेत्र के पंख लिए आप

उड़ते हैं सब कानून के आसमान पर

फिर मैं ही क्यों पंखहीन बेड़ी में जकड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

प्यार है दुलार है सुखी सब संसार है

चाचा,मामा,मौसा जैसे ढेरों रिश्ते हैं

ममता,स्नेह,अनुराग और आसक्ति पर

मैं जैसे एक थोपा हुआ झगड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

दूध से नहाए सब उजले चरित्रवान

साफ स्वच्छ ,निर्लिप्त हर कलंक से

हर सांस पाप कर कर भी सुधरे हैं

ठुकराया दुरदुराया बस मैं ही बिगड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

स्टीफ़न हाकिंग पर गर्व है सबको

चल बोल नहीं सकता,साइंटिस्ट है और मैं?

सभ्य समाज के राजसी वस्त्रों पर

इन्साननुमा दिखने वाला एक चिथड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

लोग मिले समाज बना पीढियां बढ़ चलीं

मैं घाट का पत्थर ठहरा प्रवाहहीन पददलित

बस्तियां बस गईं जनसंख्या विस्फोट हुआ

आप सब आबाद हैं बस मैं ही एक उजड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

अर्धनारीश्वर भी भगवान का रूप मान्य है

हाथी बंदर बैल सब देवतुल्य पूज्य हैं

पेड़ पौधे पत्थर नदी नाले कीड़े तक भी ;

मैं तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

वो शब्द है...

कालक्रम में शाश्वत जो गूंज रहा वो शब्द है...

सनातन पहेलियां जो बूझ रहा वो शब्द है...

हृदय में जो दब गया था

कंठ में जो रुंध गया था

अचानक सशस्त्र हो कर चल पड़ा वो शब्द है....

वो शब्द है

वो शब्द है

भिंचे हुए जबड़ों और तनी हुई मुट्ठियों से

झाग के संग ओंठों से उबल पड़ा वो शब्द है

वो शब्द है

वो शब्द है

चीखता, चिल्लाता, गुर्राता, हुंकारता,

गरजता, फुंफकारता सम्हल खड़ा वो शब्द है...

वो शब्द है

वो शब्द है

नेत्र की शिराओं में रक्त से हस्ताक्षर कर

एक बूंद अश्रु जो निकल पड़ा वो शब्द है

वो शब्द है

वो शब्द है

धरा को जो रौंद कर, जो गगन में कौंध कर

रुधिर की ले लालिमा सजल खड़ा वो शब्द है

वो शब्द है

वो शब्द है

वो शब्द है

वो शब्द है................

कालक्रम में शाश्वत जो गूंज रहा वो शब्द है...

सनातन पहेलियां जो बूझ रहा वो शब्द है...

पत्रकारिता का यथार्थ

खोपड़ी की हंड़िया में सवाल की दाल है

उत्तरों की छौंक नहीं व्यर्थ का उबाल है

कलम की करछुल का भाल में भूचाल है

पेंदी की रगड़ से हाल ये बेहाल है

ओंठो के बीच दबी बीड़ी की नाल है

आग फूंक धुंआ खींच राख सा मलाल है ,

पुष्टि नहीं तुष्टि नहीं जाल है जंजाल है

स्वप्निल यथार्थ में कंगाल ये कंकाल है ,

रौंद दिए सत्य के हाथ में कुछ बाल है

बालों की खाल पर उठ रहे बवाल हैं ,

पत्र-पत्र यत्र-तत्र पत्रकार ताल है

सत्यमेव जयते से इनका रक्त लाल है ।

साक्षात्कार: स्त्री विमर्श और सामाजिक सरोकार

{चर्चित लेखिका संतोष श्रीवास्तव से कुमारेन्द्र सिंह सेंगर(लेखक, संपादक - स्पंदन त्रैमासिक) की स्त्री विमर्श के मुद्दों पर बातचीत}
संतोष जी ई स्त्री विमर्श पर एक पुस्तक "सामयिक प्रकाशन” से अभी-अभी प्रकाशित हुई है, "मुझे जन्म दो मां"। पिछले दस वर्षों से समरलोक पत्रिका में ’अंगना’ नामक स्तम्भ निकल रहा है जो स्त्री विमर्श पर आधारित रहता है। यह स्तम्भ बहुत अधिक लोकप्रिय रहा है। यह साक्षात्कार भी मैंने इसी विषय को आधार बनाकर लिया है।
प्र. संतोष जी, आज मैं आपसे केवल स्त्री विमर्श पर ही चर्चा करूंगा क्योंकि अब यह विमर्श गहराता जा रहा है जबकि इस तर्क से मैं जहां तक पाता हूं, कोई अंतर नहीं आया है। स्त्री या तो वहीं खड़ी है जहां वह पहले थी या उसने अपनी राह खुद बनाई है। आपने किस बात से प्रेरित होकर ’अंगना’ की शुरूआत करी और इतनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी?
उ. मेरा परिवार माता-पिता, भाई-बहन प्रगतिशील विचारों के थे। समाज में जब भी कुछ ऐसा घटित होता जो औरत के खिलाफ़ होता तो उसकी चर्चा कई-कई दिनों तक हमारे रात्रि भोजन के दौरान होती रहती। उन चर्चाओं में वक्त ने मेरे अनुभव भी जोड़ दिये। बहुत कुछ मुझ पर गुजरा, काफ़ी कुछ समाज से उठाया.... ऐसा थर्रा देने वाला सच जिसे वर्षों पहले मैंने जाना ही नहीं था.... आज सोचती हूं तो लगता है जैसे जैसे स्त्री की समस्याएं सामने आती हैं वे और बढ़ती जाती हैं सुरसा के मुंह की तरह.... अब वे विश्वव्यापी हो गयी हैं और हमें सोचने पर मजबूर करती हैं।
प्र. स्त्री विमर्श शब्द विवाद का विषय रहा है। आपके विचार से साहित्य में, समाज में ऐसी कोई अवधारणा है भी या फिर यह स्त्री रचनाकारों के मन की कल्पनामात्र है?
उ. समाज में हर वो वस्तु या धारणा विवाद का विषय रहती है जिसमें मतैक्य नहीं होता। स्त्री विमर्श को लेकर पिछले कुछ सालों से साहित्य में जो हलचल मची हुई है उसने विचारकों को, साहित्यकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सचमुच स्त्री को लेकर विमर्श जैसी किसी अवधारणा की जरूरत है?यह बहुत संवेदनशील बात है जो प्रतिपल-प्रतिक्षण समाज में दिखाई देती है। यह कोरी कल्पना नहीं है और न ही केवल स्त्री रचनाकारों तक ही सीमित है। रामायण, महाभारत में सीता, अहिल्या और द्रौपदी जैसी पुरुषों द्वारा प्रताड़ित नारियों का राम और कृष्ण ने चमत्कारी ढंग से उद्धार किया। स्त्री के प्रति उनका ऐसा दृष्टिकोण, उनकी मर्यादाओं की रक्षा समकालीन स्त्री विमर्श के लिये सोचने का मुद्दा है। बहुत पहले मार्क्स के समकालीन एंगेल्स ने कहा था कि ’उद्यमों में समूचे महिला समुदाय का प्रवेश महिला-मुक्ति की पहली बुनियाद है।’ समाज में ऐसा बहुत कुछ संभव हुआ है और बहुत कुछ होने जा रहा है।
प्र. साहित्य में स्त्री विमर्श का उद्देश्य क्या रहा है? क्या इससे समाज में स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में सार्थक, सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं या फिर देह की आज़ादी, परिवार से आज़ादी ही स्त्री विमर्श का मूल उद्देश्य रहे हैं?
उ. साहित्य में स्त्री विमर्श का उद्देश्य तो अभी तक मैं समझ नहीं पायी हूं। अगर स्त्री विमर्श के तर्कों से ही महिला सशक्त हो जाती तो अब तक पूरा समाज ही बदल जाता। स्त्री की दशा तो जस का तस ही है। आप पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहो लेख, करते रहो नारेबाजी पर इस सबसे सदियों से जड़ जमाए स्थितियां तो नहीं बदल जाती। नारी मुक्ति के कानून बस कागज़ों पर ही बनते हैं। स्त्री आज भी घरेलू गुलामी की सीमा तक पार नहीं कर पायी है। घर के तमाम काम और जिम्मेदारियां बड़ी सफाई से उसकी ही गांठ में बांध दी गयी हैं और वह इन कामों को करती घरेलू चाकरी में खुद को स्वाहा किये जा रही है। देह की आज़ादी से औरत क्या हासिल कर लेगी? परिवार की आज़ादी से उसे कौन सा सुकून मिल जाएगा? इन दोनों प्रकार की आज़ादी में टूटेगी स्त्री ही। देह की अपनी अहमियत है और परिवार की अपनी। दोनो अपनी-अपनी जगह बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। समाज का ढांचा स्त्री-पुरुष के संग साथ से ही खड़ा होता है। समाज से देश विकसित होता है। आज चूंकि भारत आर्थिक पिछड़ेपन की त्रासदी से जुज़र रहा है ऐसी हालत में स्त्री पुरुष दोनों को अपनी-अपनी सोच खंगालनी होगी। निज से ऊपर उठ कर सोचना होगा। असली सशक्तिकरण वही है।
प्र. महिला द्वारा महिला का शोषण जो समाज में व्यापक रूप में फैला हुआ है स्त्री विमर्श के नाम पर एक शिक्षित नारी भी इसका विरोध क्यों नहीं करती? कहीं ऐसा तो नहीं कि स्त्री विमर्श की अवधारणा पुरुष विरोध पर ही कायम है??
उ. जहां तक स्त्री विमर्श की अवधारणा पुरुष विरोध पर कायम है, इस बात को मैं एक संतुलित वक्तव्य की संग्या नहीं दूंगी। अगर स्त्री का एक वर्ग ऐसा है जो पुरुष विरोध को ही अपना लक्ष्य मानता है तो एक वर्ग ऐसा भी है जिसने पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही सार्थकता पायी है। पुरुष को भी स्त्री को अपने साथ बराबरी से चलने को ’विरोध’ नहीं कहना चाहिये... आखिर वो क्यों चाहता है कि स्त्री उसके कदमों के पीछे छूट गए निशानों पर ही चले? महिला द्वारा महिला का शोषण ठीक वैसा ही है जैसे एक शक्तिशाली पुरुष द्वारा कमज़ोर पुरुष का शोषण। इसे स्त्री या पुरुष में बांटना मूलभूत भूल है। शोषण ताकत के साथ निहित है। यदि बहू ताकतवर है(यहां ताकत से मतलब शारीरिक ताकत नहीं बल्कि धन, पद और रुतबे की ताकत है) तो सास-ससुर को घर से निकाल देती है। कितने ही ऐसे पुरुष हैं जो पत्नी पीड़ित हैं। हमारी सोच का नज़रिया सिर्फ़ महिला तक ही सीमित नहीं होना चाहिये। ये सोचना गलत है कि शिक्षित नारी ऐसे शोषण का विरोध नहीं करती। यहा मात्र भ्रान्ति है। कई ऐसे उदाहरण हैं जहां सास के द्वारा बहू को प्रताड़ित किये जाने पर बेटी ने अपनी मां का विरोध किया है। अगर हम वैसे उदाहरणों को देखते हैं तो ऐसे उदाहरणों को क्यों नहीं सामने लाते? हम खुद ही निगेटिव उदाहरणों को केन्द्र में लाकर पाजिटिव उदाहरणों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। जो इकतरफा माना गया विचार कहलाएगा।
प्र. साहित्य में स्त्री पुरुष दोनो का ही हस्तक्षेप है। स्त्री को केन्द्र में रख कर दोनो ने ही अपनी कलम चलाई है। स्त्री विमर्श और सामाजिम सरोकारों के संदर्भ में किसके लेखन को आप प्रभावी और संवेदनशील स्वीकारती हैं?
उ.यह कहना बड़ा कठिन है क्योंकि न तो लेख की प्रत्येक रचना अच्छी होती है और न ही उस पर वैसी कोई धारणा बनाई जा सकती है। कभी-कभी लेखक या लेखिका ऐसी प्रभावी रचना लिख डालते हैं जो सालोंसाल मन को मथती रहती है। स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखी ऊषा प्रियम्वदा की "रुकोगी नहीं राधिका", नासिरा शर्मा की "शाल्मली", मृदुला गर्ग की "कठगुलाब", इन्द्र बसावड़ा की "शोभा", "घर की राह" किसी क्रान्ति से कम नहीं हैं। इन उपन्यासों ने गहरे छुआ है। स्त्री विमर्श और सामाजिक सरोकारों के संदर्भ में लेखक और लेखिकाओं के द्वारा काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है। कोई प्रभावी होता है कोई नहीं। असल में स्त्री की तमाम घरेलू दुविधाओं से लेकर जी-२० सम्मेलन तक का जो पूरा परिदृश्य है उसी के बीच उसके जीवन की समस्याओं के साथ भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद और राजनैतिक पहलुओं को भी जोड़ कर देखना चाहिये।
प्र. ऐसा कहा जाता है कि शिक्षा स्त्री सशक्तिकरण का प्रमुख सोपान है फिर भी ज्यादातर स्त्रियां परम्परागत स्त्री छवि से बाहर नहीं आ सकी हैं। शिक्षित स्त्री काभी शारीरिक, मानसिक शोषण(स्त्री व पुरुष दोनो के द्वारा) हो रहा है, इसके मूल में क्या अंतर्निहित है?
उ. यह बहुत कड़वी सच्चाई है कि पढ़ी-लिखी स्त्री का भी शारीरिक मानसिक शोषण हो रहा है। जमाना तेजी से बदला है। बाज़ारवाद ने जिस ढंग से जीवन के हर क्षेत्र में पांव पसारे हैं वह शोचनीय है। उसने एक चकाचौंध भरी दुनिया का निर्माण करा है। जिसमें वे कुछ भी करने को तैयार हैं। यह काम यदि स्त्री के द्वारा होता है जिसमें पुरुष शोषक है और स्त्री शोषित है तो उस पर सबकी नजरें उठ जाती हैं लेकिन यदि पुरुष शोषक भी है और शोषित भी तो उस पर तवज्जो नहीं दी जाती। कई बार स्त्री को परिस्थितिवश शोषण के लिये झुकना पड़ता है। पति की मृत्यु के बाद या पिता की मृत्यु के बाद परिवार की गाड़ी खींचने के लिये.... तलाक के बाद या पिता की मृत्यु या तलाकशुदा माता के लिये वह मजबूर हो जाती है।एक बड़ी जिम्मेदारी ढोने में वह खुद को खत्म कर लेती है।
ज्यादातर शिक्षित स्त्रियां परम्परागत स्त्री छवि से बाहर नहीं आ सकी हैं। शिक्षा ने उन्हें समाज का सामना करने का हौसला तो दिया है लेकिन उनकी मानसिकता नहीं बदली है। आज भी उनमें यह भय कुंडली मारे बैठा है कि यदि पति जीवित न रहा, यदि पति ने तलाक दे दिया, यदि वे कुंवारी ही मां बन गयी तो वे क्या करेंगी? समाज उन्हें जीने देगा?? शिक्षा ने स्त्री को तो सशक्त बनाया पर समाज नहीं बदला। ऐसे में वे कब तक खुद को बदलती टिक पाएंगी? धर्म, पुराणों और ग्रन्थों ने भी औरत की नैतिकता, शुचिता को तमाम उलझनों के मकड़जाल में फंसा दिया है। नतीजा, पूरे समाज की मानसिकता रूढ़ियों में जकड़ गयी है और स्त्री ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी खो दी, और तो और महिला मुक्ति का ढिंढोरा पीटती कई स्त्रियों की स्त्रियों के द्वारा चलायी जा रही संस्थाएं भी बाकायदा आधार स्तंभ बन कर इन रूढियों को खत्म न होने देने के प्रयास में तत्पर हैं।
प्र. समाज में स्त्रियों को विधायिका एवं अन्य दूसरे क्षेत्रों में या तो आरक्षण देने की चर्चा है या फिर आरक्षण दिया जा चुका है। आप इस बारे में क्या कहेंगी कि समाज में स्त्रियों की बदलती स्थिति से साहित्य प्रभावित हुआ है अथवा साहित्य ने समाज में महिलाओं की स्थिति को प्रभावित किया है?
उ. जब आरक्षण का मुद्दा नहीं उठा था तब भी स्त्री विधायिकाएं थी और आज जब उठा है तब भी विधायिकाएं हैं। उनकी संख्या में कमी या बढोत्तरी नहीं हुई है। स्त्रियों के लिये राजनीति में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण उठाने का मुद्दा अभी तक सुनियोजित तरीके से स्थगित किया जाता रहा है और इसके पीछे भी राजनीति ही है। जहां तक साहित्य के प्रभावित होने का प्रश्न है तो देश भर की साहित्यिक पत्रिकाएं स्त्री मुद्दों पर बहस, चर्चाएं आयोजित करती हैं। स्त्री संदर्भ की कहानी, कविता, आलेख छापती हैं, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेषांक निकालती हैं और आधी दुनिया को बाकायदा नियमित स्तंभ में जगह देती हैं पर इससे कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं होती है। कितना कुछ छप रहा है स्त्री विमर्श पर लेकिन फिर भी लगता है बात जहां की तहां खड़ी है। भूमंडलीकरण के इस युग में जड़ स्थितियों को बदलने में बहुत वक्त लगेगा।
साहित्य ने समाज में महिलाओं की स्थिति को कहां तक प्रभावित किया है यह बैठकर गहराई से सोचने का विषय है। साहित्य समाज का दर्पण है। वह एक ऐसा मंच है जो समाज को वस्तुस्थिति से परिचित कराता है। साहित्य ने इस विषय पर तह तक जाने की कोशिश तो की है।
प्र. साहित्य में नारी की जैसी छवि चित्रित की जा रही है उससे समाज में नारी के दो स्वरूपों का आधार निर्मित हुआ है। एक में सीता सावित्री जैसी महिलाओं को रखा जाता है और दूसरे में नारी छवि को "होमब्रेकर" के रूप में देखा जाता है। ऐसा क्यों है और सामाजिक सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में आपको औरत का कौन सा स्वरूप ज्यादा सार्थक लगता है?
उ. सीत्रा सावित्री जैसी छवि तो साहित्य की संरचनाकाल से ही छित्रित होती रही है। आज उस छवि को पाठक नकार भी रहे हैं। उन्हें हारी हुई शोषिता, गलत के आगे समर्पित, रोती गिड़गिड़ाती स्त्री की कहानियां पसंद नहीं आतीं। सीत्रा सावित्री का विलोम शब्द "होमब्रेकर" नहीं है। कहीं भी स्त्री को सशक्त करने के लिये परिवार को तोड़ने की बात नहीं कही गयी है बल्कि परिवार तो जीवन की प्रथम और अनिवार्य इकाई है। फिर भी परिवार टूट रहे हैं तो इसके पीछे महिला का सशक्तिकरण नहीं है वल्कि जिन्दगी जीने का पूरा ढंचा बदल जाने की सोच है। बाज़ारवाद, भूमंडलीकरण स्त्री को मोहरा बनाकर किए गए उत्पादन, विश्व सौंदर्य प्रतियोगिता, माडलिंग, फ़िल्म, टेलीविज़न इन सबके लिये थोड़े-थोड़े जिम्मेदार हैं....क्योंकि इन क्षेत्रों में पारिवारिक नहीं बल्कि सभी जिम्मेदारियों से मुक्त स्त्री को ही प्राथमिकता दी जाती है। कुछ क्षेत्रों में से शादीशुदा शब्द ही शब्दकोष से निकाल दिया गया है। जहां तक सामाजिक सरोकारों के परिप्रेक्ष्य में औरत के पसंदीदा स्वरूप की बात है तो निश्चय ही खुले विचारों वाली, पढ़ी-लिखी, नौकरीपेशा एक पारिवारिक महिला का स्वरूप ही सार्थक है जिसकी सोच पुरुष विरोधी नहीं बल्कि पुरुष के कदमों से कदम मिला कर चलने की है।
प्र. आज की महिला में आत्मविश्वास पनपा है, वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र भी हुई है। स्त्री विमर्श के नाम पर इस प्रकार की पैरोकारी की जाती रही है कि पति-पत्नी के आपसी अथवा पारिवारिक विभेद होने की दशा में आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री को अलग हो जाना चाहिये, सम्बन्ध विच्छेद कर लेने चाहिये। क्या इस तरह के विचार स्त्री-सशक्तिकरण की सफलता है अथवा सामाजिक सरोकारों/पारिवारिक ढांचे के विखण्डन के सूत्रधार हैं?
उ. निश्चय ही इस तरह के विचार दूषित विचार कहे जाएंगे। ऐसी मानसिकता चंद विद्वानों को स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में हाशिए पर ढकेलकर बढ़ना होगा। आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री तो अपने परिवार को उच्च स्तर का सुख-सुविधाओं से भरा जीवन देने में खुद को धन्य मानती है। आर्थिक सक्षमता का मतलब यह तो नहीं कि वह परिवार को दरकिनार कर उद्दंड हो जाए और समझ ले कि अब वह स्वच्छंद है। जो जी में आए कर सकती है। स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता को बढ़ावा देना घुमा फिरा कर स्त्री को वहीं का वहीं ला कर खड़ा कर देना है जहां से उसकी मुक्ति का मार्ग खुला था और सामाजिक नियम पुरुषों के लिये भी हैं, स्त्रियों के लिये भी। इन्हें जो भी तोड़ेगा वह दंड का भागीदार है। ऐसे विचार कभी भी स्त्री को सशक्त नहीं कर सकते।
प्र. साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम पर नारी की यौन स्वच्छंद छवि, ’होमब्रेकर’ की छवि, उन्मुक्त छवि को अधिक एक्सपोज़र प्रदान किया गया। आपको नहीं लगता कि इससे सामाजिक सरोकारों और स्वयं नारी का स्वरूप प्रभावित हुआ है?
उ. चंद साहित्यिक पत्रिकाएं यदि स्त्री विमर्श के नाम पर नारी की यौन स्वच्छंद छवि, होमब्रेकर उन्मुक्त छवि को महिला सशक्तिकरण मानती हैं और यही सब छापती हैं तो ये उनकी बीमार मानसिकता है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती देहवादी साजिशों से सावधान रहने की है। स्त्री विमर्श का अर्थ मात्र स्त्री शारीर और प्रेम के त्रिकोणों के चमत्कारी बयानों से न होकर आज के बाहरी और आन्तरिक दबावों को झेलती स्त्री का मन, उसकी सोच और उसके सम्पूर्ण अंतरंग और बहिरंग से है। मैं नहीं मानती कि इस तरह के एक्सपोज़र का असर सामाजिक सरोकारों पर पड़ा है या नारी के स्वरूप पर। जिन्हें परिवार तोड़ना है और अलग रहकर अपने लक्ष्य को पाना है वे तो पहले से ही ऐसा कर रही हैं। यही बात यौन स्वच्छंदता पर भी लागू होती है पर इससे पूरे समाज को इसी रंग में रंगा हुआ नहीं मान लेना जाए यह सही नहीं है। मर्यादित नारियां आज भी ८० प्रतिशत के आंकड़े पर हैं।
प्र. एक सामान्य पाठक की दृष्टि से स्त्री विमर्श के संदर्भ में आपको किस महिला उपन्यासकार ने सर्वाधिक प्रभावित किया है और किस महिला उपन्यासकार ने सामाजिक सरोकारों का सकारात्मक पोषण किया है?
उ. एक सामान्य पाठक की दृष्टि से स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में आजकल लेखिकाओं ने स्त्रियों की छवि को जरा अलग हटकर लिखा कि उसे स्त्री विमर्श का नाम दे दिया जाता है। पंजाबी लेखिकाओं में अमृता प्रीतम, अजीत कौर चुनौतीपूर्ण लेखन करती थीं। बहुत प्रभावित हूं मैं इनसे। पाकिस्तानी लेखिकाएं भी प्रभावित करती हैं। तहमीना दुर्रानी के "कुफ़्र" ने मुझे झंझोड़ा है और "मेरे आक़ा" ने मेरे विचारों को खलबला दिया है। क्या पुरुष की नजर में यही है औरत के मायने? कालेज के जमाने में मन्नू भंडारी की "आपका बंटी" बड़ी असरदार लगी थी। इस्मत चुग़ताई की "अगले जनम मोहे बिटिया न कीजे" और कृष्णा सोबती की "मित्रो मरजानी" में सामाजिक सरोकारों का सकारात्मक पहलू है।
प्र. साहित्य में चर्चित स्त्री विमर्श के द्वारा आप समाज में महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन देखती हैं? यह परिवर्तन किस वर्ग की महिलाओं में और किस प्रकार से हुआ है??
उ. साहित्य में चर्चित स्त्री विमर्श के द्वारा निम्नवर्ग की श्रमिक औरतों के बारे में काफी लिखा गया है और श्रमिक वर्ग को जब उनके कानूनी अधिकार समझाए गये तो उन्होंने उससे लाभ भी उठाया। मध्यवर्ग और उच्चवर्ग की स्त्रियां श्रमिक वर्ग की स्त्रियों से भिन्न लेकिन समस्याओं के अलग दौर से गुजरती हैं। आर्थिक रूप से सम्पन्न होना उन समस्याओं को सुलझाने में कतई मदद नहीं करता जो सदियों से पुरुषवादी मानसिकता और पुरुषों के सामंती वर्चस्व ने उन पर थोपे हैं। बल्कि कई बार भौतिक सुविधाओं ने स्त्री के लिये अलग किस्म के पिंजड़ों में उन्हें जकड़ा है। स्त्री विमर्श के द्वारा न तो ये समस्याएं सुलझी हैं न ही इसमें कोई अंतर आया है।
[ यह साक्षात्कार कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने अपने शोध प्रबन्ध(पी.एच.डी.) में लिया है ]

Wednesday, May 25, 2011

हेमन्त फ़ाउन्डेशन द्वारा हिन्दी-उर्दू साझा मंच निर्माण हेतु गोष्ठी

बांए से दांए : संतोष श्रीवास्तव(मैनेजिंग ट्रस्टी,हेमन्त फ़ाउंडेशन), वरिष्ठ साहित्यकार श्री अहमद सोज़, वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार श्री आलोक भट्टाचार्य, वरिष्ठ हिंदी-उर्दू लेखिका श्रीमती नग़मा जावेद मलिक

बांए से दांए: समीक्षक-कवियत्री श्रीमती सुमीता केशवा, उर्दू वेबसाइट "लंतरानी" की संचालिका-मुख्यसंपादिका श्रीमती मुनव्वर सुल्ताना, हेमन्त फ़ाउंडेशन के उपाध्यक्ष श्री सोनू पाहूजा


बाएं से दांए : वरिष्ठ हिंदी-उर्दू लेखिका श्रीमती नग़मा जावेद मलिक, कवियत्री-भाषाविदुषी श्रीमती शिल्पा सोनटक्के, समीक्षक-कवियत्री श्रीमती सुमीता केशवा
बांए से दांए : संतोष श्रीवास्तव(मैनेजिंग ट्रस्टी,हेमन्त फ़ाउंडेशन), वरिष्ठ साहित्यकार श्री अहमद सोज़, वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार श्री आलोक भट्टाचार्य, वरिष्ठ हिंदी-उर्दू लेखिका श्रीमती नग़मा जावेद मलिक
बांए से दांए : उर्दू शायरा श्रीमती आयशा शेख समन, संतोष श्रीवास्तव(मैनेजिंग ट्रस्टी,हेमन्त फ़ाउंडेशन), वरिष्ठ साहित्यकार श्री अहमद सोज़

बाएं से दांए : उर्दू वेबसाइट "लंतरानी" की संचालिका-मुख्यसंपादिका श्रीमती मुनव्वर सुल्ताना, हेमन्त फ़ाउंडेशन के विश्वस्त श्री सोनू पाहूजा



संभावनाशील युवा कवि स्व.हेमंत के जन्मदिन २३ मई के अवसर पर जे.जे.टी. विश्वविद्यालय [राज.] के साहित्यिक विभाग हेमंत फ़ाउंडेशन ने हिन्दी उर्दू ज़बानों के पारस्परिक सौहार्द एवं विकास के मद्देनज़र 'आशिकाने हिन्दी-उर्दू मंच' की स्थापना की। इस मंच का दोनों ज़बानों का साहित्यकारों ने स्वागत किया। स्व. हेमंत की स्मृति में आशिकाने हिन्दी उर्दू मंच के सदस्यों वरिष्ठ शायर अहमद सोज़, आलोक भट्टाचार्य, शायरा संतोष श्रीवास्तव, सुमीता केशवा, डा. नगमा जावेद, डा. आयशा शेख, शिल्पा सोनटके ने अपनी गज़लों, कविताओं से कार्यक्रम को भावभीना बना दिया। फ़ेमस टी.वी कलाकार सोनू पाहूजा ने उपस्थित सदस्यों का धन्यवाद किया।हिन्दी वेबपत्रिका शब्द के संपादक डा. रुपेश श्रीवास्तव तथा लंतरानी वेबपत्रिका की संपादक मुनव्वर सुल्ताना ने अपनी वेबसाइट का प्रदर्शन कर हेमंत फ़ाउंडेशन को नया आयाम दिया। मंच के अनुपस्थित सदस्यों विनोद टिबड़ेवाला, डा. अब्दुल सत्तार दलवी तथा जु़बैर आज़मी ने शुभकामनाएं भेजीं।
सुमीता केशवा
कार्याध्यक्ष-हेमंत फ़ाउंडेशन

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय समारोह



लाहौर-पाकिस्तान से इस आयोजन में शरीक होने आई फ़ैज़ साहब की सुपुत्री डॉ. मुनीज़ा हाश्मी ने प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा 14-15 मई को इस्पात नगरी भिलाई में आयोजित फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय समारोह के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए अपना वक्तव्य देते हुए अपने बचपन की यादों से सभागार को द्रवित कर दिया। उन्होंने सभी हाज़रीन को लाहौर के फ़ैज-घर आने की दावत भी दी तथा सं

स्थान का शुक्रिया अदा किया। इसके पूर्व उन्होंने आयोजन का शुभारम्भ देश-विदेश के सैकड़ों वरिष्ठ साहित्यकारों की उपस्थिति में मंगलदीप प्रज्ज्वलित कर एवं फ़ैज़ साहब के चित्र पर माल्यार्पण कर विधिवत उद्घाटन किया।

फ़ैज़ प्रगतिशील आंदोलन की प्रेरणा में रहेगें – खगेंद्र ठाकुर

भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के आधारस्तम्भ एवं प्रख्यात आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर (पटना) ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि दिल्ली में सम्पन्न प्रेमचंद इंटरनेशनल सेमीनार में उन्होंने पहली बार फ़ैज़ के दीदार किये और उनकी नज़्म सुनी। उन्होंने कहा कि कविता के इतिहास में शायर-कवियों का क़द कम होता गया है। प्रगतिशील आन्दोलन में हमने हमने हमेशा फ़ैज, केदार और नागार्जुन आदि को अपनी सोच और प्रेरणा के केन्द्र में रखा है। पूर्वज शायर-कवियों ने जो वैचारिक लड़ाइयाँ लड़ी हैं, उस दाय को, विरासत को हम सम्हाल नहीं पा रहे हैं इसलिये भी महत्वपूर्ण रचनायें और बड़े रचनाकार सामने नहीं आ पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह तो माया और ममता का समय है - इसमें ऐसे आयोजन भी संभव हैं और हो रहे हैं - यह मेरे लिये संतोष और आशा का आसमान खोलते हैं।

महत्वपूर्ण साहित्यकारों को अँधेरे से निकालना होगा - विश्वरंजन

प्रमोद वर्मा संस्थान के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन ने स्पष्ट किया कि मुक्तिबोध, हरिशंकर परसाई, श्रीकांत वर्मा और प्रमोद वर्मा ऐसे साहित्य-साधक हुये हैं जिनसे आज भी लेखक अपनी धार लेते हैं। ऐतिहासिकता में प्रमोदजी के अनदेखे किये जाने की स्थिति में यह संस्थान एक नैतिक लेखकीय दायित्व के तहत अस्तित्व में आया। इससे हम यह संदेश भी देना चाहते हैं कि ऐसे बहुतेरे महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं जिन्हें व्यवस्थित रूप से अँधेरे में ही रखने के कुचक्र सक्रिय हैं। अतः प्रमोद वर्मा संस्थान इस प्रवृत्ति, प्रकृति और निष्क्रियता से उपजे शून्य को भरने

का एक विनम्र प्रयास है। अधिकाधिक लेखकों को प्रकाशित करना इसकी एक कड़ी है।

मेरी आश्नाई की शुरुआत फ़ैज़ से – डॉ. धनंजय वर्मा

प्रखर समालोचक डॉ. धनंजय वर्मा ने विस्तार से फ़ैज़ की शायरी और उनके द्वन्द्व पर प्रकाश डालते हुये कहा कि उर्दू शायरी से मेरी आश्नाई की शुरूआत फ़ैज़ की शायरी से ही हुई थी।

साहित्य मानवीय संस्कृति का विकास करे- डॉ. अजय तिवारी

आलोचक डॉ. अजय तिवारी ने कहा कि साहित्य को इतिहास से अलग कर के नहीं देखा जा सकता। वैयक्तिक प्रतिभा के साथ इतिहास का चक्र ही ऐसे नामचीन लेखकों को जन्म देता है। क्या कारण है कि 1910-11 एक-दो नहीं 23 महत्वपूर्ण नामी-गि़रामी लेखकों जन्मशती का वर्ष है। ये तमाम लेखक स्वतंत्रता और क्रान्तिकारी आन्दोलनों की उपज हैं। हम भारत में केदार और फ़ैज़ की जन्म शताब्दी एक मंच पर एक साथ मना रहे हैं, यह भारत की सांस्कृतिक बुनियादी विशेषता है जो साहित्य में

भाषा और सरहदों की सीमाओं दरकि़नार कर लोक-कल्याण को सर्वोपरि रखती है। साहित्य की यही भूमिका भी है कि वह मानवीय संस्कृति का विकास करे।

उद्घाटन अवसर पर प्रमोद वर्मा संस्थान के महासचिव व शायर मुमताज़ ने स्वागत वक्तव्य दिया। संस्थान के उपाध्यक्ष व श्री कवि रवि श्रीवास्तव ने उद्घाटन सत्र का संचालन किया। स्वागताध्यक्ष श्री अशोक सिंघई अतिथियों का पुष्पगुच्छ से हार्दिक स्वागत किया।

नयी कृतियों का विमोचन

इस अवसर पर विश्वरंजन के सम्पादन में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर प्रकाशित एकाग्र ‘सच जि़न्दा है अब तक’ एवं केदारनाथ अग्रवाल पर प्रकाशित एकाग्र ‘बांदा का योगी’ का लोकार्पण हुआ। इन महत्वपूर्ण संकलनों के साथ लाला जगदलपुरी की किताब ‘गीत धन्वा’, डॉ. दयाशंकर शुक्ल की पुनर्प्रकाशित ‘छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य का अध्ययन’, शिवशंकर शुक्ल की ‘डोकरी के कहिनी’, रवि श्रीवास्तव की ‘नदी थकने नहीं देती’, सुनीता वर्मा की ‘घर घुंदिया’, शंभुलाल बसंत की ‘इंक्यावन नन्हे गीत’, विश्वरंजन/आर.के. विज़/जयप्रकाश मानस की ‘इंटरनेट, अपराध और कानून’ के साथ ही जयप्रकाश मानस की तीन अन्य कृतियों ‘विहंग’, ‘जयप्रकाश मानस की बाल कवितायें’ तथा छत्तीसगढ़ की लोककथाएँ रमेश गुप्त का कविता संकलन ‘त्रिवेणी’, आदि कृतियों के लोकार्पण विशिष्ट अतिथियों द्वारा सम्पन्न हुए।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर केंद्रित प्रथम सत्र ‘क़ैद-ए-क़फ़स से पहले’ में बीज वक्तव्य दिया पाकिस्तान से पधारे अब्दूर रऊफ़ । इस सत्र में कुमार पंकज, डॉ. धनंजय वर्मा, अजय तिवारी सहित मुनीज़ा हाश्मी ने फ़ैज़ की शायरी पर व्यापक विमर्श किया । सत्र की अध्यक्षता की पाकिस्तान की वरिष्ठ आलोचक आरिफ़ा सैयदा । सत्र का सुव्यवस्थित संचालन किया युवा आलोचक पंकज पराशर ने । द्वितीय सत्र ‘शामे-सहरे-यारां’ की अध्यक्षता की आलोचक याकूब यावर ने । बीज वक्तव्य दिया मौसा बख़्श ने । इस अवसर, खगेंद्र ठाकुर, डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे, मुनीजा हाश्मी, पंकज पराशर, फ़ज़ल इमाम मल्लिक और डॉ. रोहिताश्व आदि वक्ताओं ने अपनी बात रखी ।

दो प्रतिष्ठित कवियों का सम्मान

रात्रि कालीन आयोजन में समग्र व विशिष्ट साहित्यिक योगदान के लिये उर्दू के नामचीन वरिष्ठ शायर ज़नाब बदरुल क़ुरैशी बद्र, दुर्ग एवं भिलाई के वरिष्ठ कवि श्री हरीश वाढेर को

प्रमोद वर्मा सम्मान से सम्मानित किया गया । उन्हें संस्थान की ओर से शॉल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और संस्थान द्वारा प्रकाशित कृतियाँ आदि प्रदान कर अंलकृत किया गया ।

अन्तरराष्ट्रीय मुशायरा ‘महफ़िल-ए-सुख़न’ सम्पन्न


प्रगतिशील शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जन्मशती समारोह के अंतिम और रात्रिकालीन सत्र में देश-विदेश के ख्यातिलब्ध शायरों ने अपनी शायरी से फ़ैज़ साहब को याद किया और गंगा-जमुनी संस्कृति को और भी पुख़्ता करते हुये उर्दू और हिन्दी ज़ुबानों की मिलनसारिता सिद्ध की। इस अन्तरराष्ट्रीय मुशायरे की सदारत (अध्यक्षता) पाकिस्तान की मशहूर शायरा डॉ. आरिफ़ा सैयदा साहिबा ने की। लाहौर से भिलाई पधारीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की साहबज़ादी डॉ. मुनीज़ा हाश्मी मुख्य अतिथि थीं। मौक़े पर पाकिस्तान के जिओ टीव्ही. के डायरेक्टर अब्दूर रऊफ़ साहब एवं दुर्ग के महापौर डॉ. एस.के. तमेर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

अध्यक्षीय आसंदी से मुबारक़बाद देते हुये डॉ. आरिफ़ा सैयदा साहिबा ने कहा कि उर्दू और हिंदी भाषायें, पाकिस्तानियों और हिन्दुस्तानियों की तरह मिलनसार हैं। यह हमारी सांस्कृतिक एकरूपता का बुनियादी और ठोस बयान है। उन्होंने फ़ैज़ साहब की रचनाओं का प्रभावी पाठ भी किया। संस्थान के निदेशक श्री जयप्रकाश मानस ने तरन्नुम में फ़ैज़ साहब की ग़ज़लों का पाठ कर महफ़िल को भाव-विभोर कर दिया। देर रात तक चले मुशायरे में बनारस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रमुख डॉ. याक़ूब यावर, दिल्ली के युवा कवि व पत्रकार फ़ज़ल इमाम मल्लिक के साथ स्थानीय तथा जाने-माने शायरों में फ़ैज़ सम्मान से सम्मानित बदरूल क़ुरैशी बद्र, अशोक शर्मा, मुकुन्द कौशल, नजीम कानपुरी, क़ाविश रायपुरी, डॉ. संजय दानी, साकेत रंजन प्रवीर, डॉ. नौशाद सिद्दीकी, रामबरन कोरी ‘क़शिश’, मोहतरमा नीता काम्बोज़ और निज़ामत कर रहे शायर मुमताज़ ने अपनी नायाब रचनायें पेश कीं।

‘जहाँ गिरा मैं, कविताओं ने मुझे उठाया’


द्वितीय दिवस 15 मई, 2011 प्रगतिशील धारा के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती समारोह के अन्तर्गत को देश के ख्यातिलब्ध कवियों ने कविताओं की धार से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। भिलाई निवास में देर रात तक सम्पन्न ‘जहाँ गिरा मैं, कविताओं ने मुझे उठाया’ राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी में देश के नामचीन कवियों ने बेहतरीन कविताओं से केदारजी को शब्दांजलि दी। इस अति महत्वपूर्ण काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. धनंजय वर्मा (भोपाल), डॉ. खगेन्द्र ठाकुर (पटना), डॉ. अजय तिवारी (नई दिल्ली), डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल (नई दिल्ली) एवं प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष व कवि श्री विश्वरंजन, पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ ने की।


सर्वप्रथम संस्थान के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन ने श्रीमती सुनीता अग्रवाल (केदारजी की पौत्री) का शॉल, श्रीफल व स्मृतिचिन्ह एवं संस्थान की कृतियाँ भेंट कर सम्मान किया।

पहले चरण में केदारजी की कविताओं का पाठ उनकी पौत्री श्रीमती सुनीता अग्रवाल, संस्थान के निदेशक श्री जयप्रकाश मानस व मुमताज ने किया। अध्यक्षीय आसंदी से डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने आयोजन की सफलता पर बधाई देते हुये कहा कि केदारजी की कविताओं के बरअक्स उनकी शान में आज पढ़ी गई कविताओं में आज के समय की अनुगूँज है।

इस गोष्ठी की विशेषता यह रही कि अध्यक्ष मंडल से डॉ. खगेन्द्र ठाकुर एवं श्री विश्वरंजन ने भी काव्यपाठ किया। इनके साथ प्रमोद वर्मा सम्मान से सम्मानित हरीश वाढेर (भिलाई), फ़ज़ल इमाम मलिक (दिल्ली), माताचरण मिश्र (भोपाल), डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे (लातूर), प्रो. रोहिताश्व (गोवा), भारत भारद्वाज (नई दिल्ली), नंद भारद्वाज (जयपुर), श्री श्रीप्रकाश मिश्र (इलाहाबाद), डॉ., प्रताप राव कदम (खण्डवा), रमेश खत्री (जोधपुर), संतोष श्रीवास्तव (मुम्बई) ने अपनी 'औरत' कविता पढ़कर समां बांध दिया और खास फरमाइश पर चंद शेर सुनाये , भोपाल से आई जया केतकी ने अपने दो उत्कृष्ट रचनाओ का पथ किया , इला मुखोपाध्याय (भिलाई), संतोष झाँझी (भिलाई), श्री रवि श्रीवास्तव (भिलाई) एवं संचालक अशोक सिंघई ने अपनी उत्कृष्ट रचनायें प्रस्तुत कीं। संस्थान के उपाध्यक्ष व कवि अशोक सिंघई ने गोष्ठी का संचालन किया। संस्थान के वरिष्ठ उपाध्यक्ष व लेखक डॉ. सुशील त्रिवेदी ने आभार व्यक्त किया ।

Tuesday, May 24, 2011

जया केतकी द्वारा संतोष श्रीवास्तव का साक्षात्कार


जीवन परिचयः मध्यप्रदेश के मंडला जिले में 23 नवम्बर 1958 को जन्म लेकर साहित्य की साधना में 34 वर्ष से रत संतोष जी हँसमुख व्यक्तित्व की धनी हैं। रायपुर प्रवास के दौरान आपसे बातचीत का अवसर प्राप्त हुआ। हाल ही में रायपुर की ‘ऋचा‘ नामक संस्था द्वारा सम्मानित संतोष श्रीवास्तव जी की अब तक 150 से अधिक कहानियाँ प्रकाषित हो चुकी हैं। वर्तमान में मुम्बई के श्री घनश्यामदास पोत्दार महाविद्यालय में शोध समन्वयक के पद पर कार्यरत संतोष जी प्रमुख रूप से स्त्री विमर्श पर आबद्ध हैं। उनके परिवार में उनके पति और बेटे का निधन हो गया है। उनके अनेक कविता संग्रह, कहानी संग्रह तथा उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी कुछ रचनाओं पर छात्रों द्वारा शोध किया जा रहा है।
जया केतकी :- अन्य महिलाओं की तरह स्थापित होने के लिए आपको भी संघर्ष करना पड़ा?
संतोष श्रीवास्तव :- लेखन के क्षेत्र में स्थापित होने के लिए मुझे संघर्ष नहीं करना पड़ा। पढ़े-लिखे प्रतिष्ठित परिवार में मेरा जन्म हुआ। मुझे घर में ही लेखन का माहौल मिला। मेरे बड़े भाई विजय वर्मा लेखक थे। मेरी बहन प्रमिला वर्मा भी लिखती हैं। मैं यदि यह कहूँ कि लेखन ही मेरे जीवन का आधार है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
जया केतकी :- संतोष जी आपकी पहली रचना कौन सी थी?
संतोष श्रीवास्तव :- जब मैंने लिखना आरम्भ किया तो ये नहीं सोचा था कि संभालकर रखूँगी या किसी पत्र-पत्रिका में रचना छपेगी। आरम्भ में मैंने कविताएं ही लिखी। पहली रचना तो याद नहीं आती, पर हाँ 1970 में मेरी पहली कहानी ‘‘शंख और सीपियाँ‘‘ तत्कालीन पत्रिका धर्मयुग में प्रकाशित हुई। उससे मेरा लेखिका होना तय हुआ।
जया केतकी :- आज विभिन्न माध्यमों में हिन्दी का जो प्रयोग किया जा रहा है इस पर क्या कहना चाहेंगी?
संतोष श्रीवास्तव :- देखिए, भाषा विचारों के आदान-प्रदान का सहज माध्यम है। हमें जो बोलने और समझने में सरल लगता है, उसे हम स्वीकार कर लेते हैं। इसी कारण अन्य भाषाओं के बहुत से शब्दों को हम शामिल करते जा रहे हैं। भाषा तो कोई भी बुरी नहीं होती और समय के साथ होने वाले परिवर्तन को स्वीकार किया जाना चाहिए। साहित्य के क्षेत्र में विशेषकर रचनाओं में भाषा की शुद्धता अपेक्षित है।

जया केतकी :- अन्य साहित्यकारों की तरह आप भी ये मानती हैं कि युवा-पीढ़ी लेखन के क्षेत्र में सटीक नहीं है?
संतोष श्रीवास्तव :- हमारी धारणा है नव युवा पीढ़ी कमजोर है, सटीक नहीं है और पुरानी विचारधारा से मेल नहीं खाती, पर यह पूरी तरह सही नहीं है। मेरा विचार इस बारे में बिल्कुल अलग और पुख्ता हैं। मेरी नजरों में युवा पीढ़ी बेहतरीन, प्रेक्टीकल और सुलझा लिख रही है। हमारे समय के साहित्यकार इमोशनल लिखते आ रहे हैं। मैं अंतरराष्ट्रीय पत्रकार मित्रता संघ की सदस्य हूं, मैंने देखा है, विदेशों में हिन्दी का माहौल सर्वत्र विस्तार पा रहा है। विश्व के मंच पर हिन्दी और हिन्दी का साहित्य बहुत समृद्ध है। रूस, न्यूयार्क में हिन्दी पढ़ाई जाने लगी है। और हमें क्या चाहिए? नए लेखकों के लेखन में जीवन झांकता है, वे लिखते हैं अतीत को छोड़कर वर्तमान से सरोकार रखकर।

जया केतकी :- क्या आप भी ये मानती है पुरूष प्रधान समाज महिलाओं के हक पर हावी है?
संतोष श्रीवास्तव :- मात्र 40 प्रतिशत महिलाएं जो अपना हक़ प्राप्त कर पाती हैं। बाकी 60 प्रतिशत को तो ये भी पता नहीं कि उनके अधिकार क्या हैं? नारी में बहुत शक्ति है। पुरूष पीड़ा नहीं सह सकता। पत्नी की मृत्यु पर पुरुष हताश हो जाता है। नारी पुरुष से अधिक सहनशील होती है। वर्तमान समय में नारी-नर समाज में एक-दूसरे के पूरक है। पुरूष की कमियां देखें तो पायेंगे कि ये धारणा बदल चुकी है। पुरूष भी अब बदल रहे हैं। युवा तो यहा तक पहुंच चुके हैं कि करवा चौथ, तीज जैसे व्रत पत्नी के साथ रखते हैं। बदलते परिवेश की महिलाओं से मेरा कहना है कि स्त्री अपने हक बचा कर रखें, स्वतंत्रता को उच्छृंखलता न समझें।
जया केतकी :- आप किसी विशेष विधा में लिखती हैं?
संतोष श्रीवास्तव :- वैसे तो मेरा सभी विधाओं में हस्तक्षेप है। महिलाओं पर समरलोक नामक पत्रिका में पिछले दस वर्षों से अंगना कालम लिख रही हूँ। सामयिक ‘मुझे जन्म दो माँ‘ । लगभग सभी विधाओं में लिखती हूं। किसी भी विधा में लिखें पर लगातार लिखें। नीलाक्षी सिंह - साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार मिला। उन्होंने अब लिखना लगभग बंद कर दिया है। एकदम से सबकुछ पा लेने के चक्कर में सबकुछ शीघ्रता से पाकर लेखन छोड़ देना उचित नहीं है।
जया केतकी :- उन घरेलू महिलाओं के लिए जो लिखने में इन्ट्रेस्टेड हैं, कोई संदेश देना चाहेंगी?
संतोष श्रीवास्तव :- सबसे पहले उन्हें ये बताया जाए लेखन के मायने क्या है? जिन 60 प्रतिषत स्त्रियों को लेकर लिखा जा रहा है उन महिलाओं तक आवाज नहीं पहुंचती, उनके लिए ऐसा लिखकर समाज को जागृत करें। उन्हें जागरूक बनाएं। मेरा मानना है कि वे इलेक्ट्रानिक मीडिया ने ऐसा किया कि वस्तु उत्पाद बन गईं महिलाएं, फुटपाथ बन गई महिलाएं। स्वयं को वस्तु और उपभोग की सामग्री बनने से बचाएं। एक और बात में कहना चाहूंगी कि एक बार लिखना आरम्भ करें तो निरन्तर लिखें।
जया केतकी :- साहित्य के क्षेत्र में भी गुटबाजी दिखाई देती है अपनी राय दें।
संतोष श्रीवास्तव :- हाँ गुटबाजी दिखाई देती है, मंच का दुरूपयोग करते हैं, छींटाकशी करते हैं। हंस, नया ज्ञानोदय में भी गुटबाजी हो रही है। विज्ञापन और धनराशि के साथ रचनाएं छापते हैं। मैंने स्वयं यह महसूस किया है, देखा है। गुटबाजी से गंभीर लेखनी के धनी और चुपचाप लिखने वाले विलुप्त हो जाते हैं। गुटबाजी से साहित्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है। लेखक समाज के प्रति अपने दायित्व निभाए। स्त्री शिक्षा, जागरूकता कानून की जानकारी ये सब करना जरूरी है। लेकिन पत्रिकाओं में लेखकों के गुट बन गए हैं। अपने-अपने की रचनाएं छापते हैं।
जया केतकी :- साहित्यक आयोजनों से किस प्रकार की उत्कृष्टता आती है?
संतोष श्रीवास्तव :- साहित्यिक आयोजनों से साहित्यकारों को मंच मिलता है। बहुत से साहित्यकारों पर, प्रेमचंद की जयंति, माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी आदि पर विचार-विमर्श होते हैं। इस प्रकार के आयोजन से युवा पीढ़ी को जानकारी मिलती है। बच्चन और निराला के समय में आयोजन नहीं होते थे तब चौराहों (चबूतरों)पर कविता पाठ करते थे। आयोजन ही लेखक की बात जन जन तक पहुंचाते हैं। इससे नए साहित्यकारों को सामने आने का अवसर मिलता है।
जया केतकी :- क्या आप भी ये मानती हैं कि साहित्यिक आयोजन, विवाद स्थल में परिणित हो रहे हैं?
संतोष श्रीवास्तव :- हाँ, कुछ स्थानों पर मैंने देखा है। कथाक्रम के आयोजन में छींटाकशी का दौर चला तो सभी एक-दूसरे पर कटाक्ष करने से पीछे नहीं रहे। नाम लेने की धृष्टता मैं नहीं करूँगी पर यह उचित नहीं। व्यक्तिगत विषयों को सार्वजनिक बनाने से बचना चाहिए।

जया केतकी :- क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया पर भारी पड़ रहा है?
संतोष श्रीवास्तव :- प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में कोई मुकाबला नहीं, प्रिंट मीडिया में पत्र पत्रिकाओं की भरमार है। हर लेखन प्रेमी जमापूंजी से पत्रिकाएं स्वांन्तः सुखाय संतुष्टि के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। विशुद्ध पत्रिकाओं की कमी है। लिखने की एक सीमा है। आत्म मुग्धता ज्यादा दिखाई देती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया में दिखाई नहीं देता कि कौन संचालक है। सामग्री एकत्रित करना स्वतंत्र लेखन का पर्याय बनता जा रहा है।
जया केतकी :- वर्तमान में पत्रिकाओं की स्थिति पर टिप्पणी करना चाहेंगी?
संतोष श्रीवास्तव :- सूचना क्रांति का प्रभाव लेखन के हर क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। इससे लेखन में गति आई है। आज के समय में पुरानी पत्रिकाओं की जो जगह है वह आज की पत्रिकाएं नहीं बना सकती। पुरानी पत्रिकाएं विषय वस्तु को गिरफ्त में लेकर चलती थी। पहले पत्रिकाओं की संख्या सीमित थी और पाठकों को चयन के अवसर कम थे। अब पत्रिकाओं की भरमार है और पाठकों की व्यस्तता के चलते उनके पास पढ़ने के लिए समय नहीं है। क्या और कितना पढ़ें, इसकी भी समस्या है।
जया केतकी :- वेब पत्रिकाओं के संदर्भ में अपने विचार दें?
संतोष श्रीवास्तव :- ब्लाग, वेब पत्रिका पर शीघ्र प्रतिक्रिया की सुविधा है। वेब पत्रिकाओं का भविष्य उज्जवल है। काफी मेहनत की जा रही है। अच्छा प्रयास है। स्वतंत्रता भी है। जैसा चाहें लिख दें। जिसे पढ़ना होगा पढ़ेगा।
जया केतकी :- संतोष जी आज की कहानियों में देह की ताकत और उन्मुक्त यौन संबंधों के प्रसंग आ रहे हैं, इन्हें आप क्या मानती हैं?
संतोष श्रीवास्तव :- बहुत ज्यादा नहीं! कथाकार आज के संबंधों को उजागर कर रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हँस के संपादक राजेन्द्र यादव ने देह को आधार बनाकर ऐसी कहानियाँ छापी जो महिलाओं के गोपनीय रहस्य उजागर करती हैं। मेरे हिसाब से स्त्री की आजादी केवल देह की आजादी नहीं है। उससे क्या मिलेगा? आजादी का मतलब है हर तरह से सोचने की आजादी, निर्णय लेने की आजादी, काम करने की, विचारों की आजादी मिले। देह की आजादी से कुछ हासिल नहीं होता। उससे तो कुछ समय बाद महिला स्वयं ग्लानि से भर उठती है।
जया केतकी :- समकालीन कहानियों में कथ्य गायब होते जा रहे हैं यानी बतकहीपन कम हो रहा है और शुष्क गद्यात्मकता प्रभावी हो रही है? आप क्या मानती हैं।
संतोष श्रीवास्तव :- कहानी, उपन्यास सभी में किस्सागोई विलुप्त हो रही है साथ ही कथन के गायब होने का भय दिखाई दे रहा है। मानवीय संवेदनाओं को छूने वाली भाषा भी अदृष्य हो रही है। कहानियों का स्तर निचला होते जा रहा है।
जया केतकी :- स्त्री विमर्श के साथ पुरुष विमर्श की भी आवश्यकता है या भविष्य में हो सकती है?
संतोष श्रीवास्तव :- हाँ जरूर होना चाहिए। पितृ सत्तात्मक गद्दी पर बैठा पुरुष यह मत समझे कि महिला ही विमर्श के लिए है। एक बात और समाज में कुछ पुरुष भी ऐसे हैं जिन पर अत्याचार होता है। इन सब बातों को ध्यान में रखें तो पुरुष विमर्श होना चाहिए। मन्नू भण्डारी ने आवाज उठाई थी।
जया केतकी :- आज के महिला कथाकारों में पसंदीदा कथाकार आप किसे मानती हैं?
संतोष श्रीवास्तव :- आज के कथाकारों का कथानक, शिल्प अपील नहीं करता। ऐसा नहीं कि बुरा लिख रही हैं। पर मुझे किरात उल ऐन हैदर, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम की रचनाएं ज्यादा आकर्षित करती है।
जया केतकी :- कथा की दुनिया में पिछले एक दशक में आप कौन सी प्रवृत्ति देख रही हैं। भाषा, कथानक, शिल्प के स्तर पर।
संतोष श्रीवास्तव:- भाषा में काफी उठान और पारदर्शिता आई है। शिल्प भी सुधरा है। माध्यम का प्रभाव, कथानक की पकड़ सभी कुछ समय के साथ बदलता है। पाठक को भी जागरूक होना पड़ेगा। वे यह न भूलें कि प्रेमचंद के नाटक दुर्गादास की प्रासंगिकता तत्कालीन थी आज के समय में नहीं हो सकती। हर लेखक की हर रचना अच्छी नहीं हो सकती। प्रेमचंद की गबन को देखिए कितनी अच्छी लिखी गई है।
जया केतकी :- आपको मिले सम्मान से आप संतुष्ट हैं?
संतोष श्रीवास्तव :- संतुष्टि.... यह बड़ा विचित्र शब्द है। मनुष्य की मानसिकता ही ऐसी है उसे पता ही नहीं होता कि वह संतुष्ट है या नहीं । एक क्षेत्र से संतुष्ट होता है तो दूसरे अन्य कारणों से असंतुष्ट रहता है। साहित्य के क्षेत्र में मैं संतुष्ट हूँ। लिख रही हूँ नियमित रूप से और आगे भी लिखती रहूँगी।
जया केतकी :- ‘बहके बसंत तुम‘ कथा संग्रह तथा आपके रचना संसार में प्रतीक और प्रयोगवाद का आविर्भाव विषय पर शोध किया जा रहा है, कैसा लगता है , बताएं?
संतोष श्रीवास्तव :- बहुत ही अच्छा लगता है। पहले जब साहित्यकारों और उनकी रचनाओं पर शोध किया जाता था तो हम सोचते थे क्या कोई और विषय नहीं, पर अब पता चलता है कि यह तो छात्रों की रुचि पर निर्भर करता है। उन्हें जो अच्छा लगता है, जिसकी रचनाएं अच्छी लगती हैं वे उन्हें ही चुनते हैं। मुझे खुशी है।

साक्षात्कारकर्त्री :- जया केतकी
 

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